NPR का विरोध करके क्या ख़ुद ही घिर गई कांग्रेस?

नागरिकता संशोधन क़ानून और एनआरसी को लेकर बहस अभी जारी ही थी कि केंद्र सरकार ने नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर यानी एनपीआर को अपडेट करने को मंज़ूरी दे दी.

इसके बाद विपक्षी दलों के नेताओं की ओर से यह सवाल उठाए जाने लगे कि सरकार का इरादा एनपीआर के बाद एनआरसी लाने का है. कांग्रेस के नेताओं के अलावा एआईएमआईएम नेता और हैदराबाद के सांसद असदउद्दीन ओवैसी ने भी इस पर सवाल उठाए हैं.

हालांकि, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने हाल ही में एएनआई को दिए इंटरव्यू में कहा कि एनआरसी और एनआरपी में कोई संबंध नहीं है.

उधर कांग्रेस की ओर से एनपीआर को मंज़ूरी देने की टाइमिंग को लेकर भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं. जवाब में बीजेपी का कहना है कि एनपीआर को लेकर अभी हंगामा कर रही कांग्रेस ने सत्ता में रहते हुए ख़ुद नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर (एनपीआर) तैयार किया था.

बीजेपी में आईटी के राष्ट्रीय प्रभारी अमित मालवीय ने कुछ ट्वीट किए हैं और कहा है कि एनपीआर कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दौरान भी लाया गया था.

उन्होंने तत्कालीन गृहमंत्री पी चिदंबरम का एक वीडियो भी ट्वीट किया है जिसमें वह बता रहे हैं कि 'मानव इतिहास में पहली बार 120 करोड़ लोगों की पहचान करने, उनकी गिनती करने और फिर पहचान पत्र देने का काम शुरू कर रहे हैं.'

इसके अलावा अमित मालवीय ने एक और वीडियो ट्वीट किया है जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी एक जगह हस्ताक्षर कर रही हैं. दावा किया गया है कि इस वीडियो में सोनिया गांधी 2011 में शुरू हुए जनगणना के लिए ख़ुद का पंजीकरण करवा रही हैं.

लेकिन कांग्रेस एनपीआर लाए जाने को लेकर बीजेपी की मंशा पर सवाल उठा रही है. इसी संबंध में कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय माकन ने कहा, "हमने भी 2011 में एनपीआर किया था लेकिन इसे कभी एनआरसी तक नहीं ले गए."

यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में जिस समय एनपीआर लागू किया गया था, उस समय अजय माकन केंद्रीय गृह राज्यमंत्री थे और 2011 के जनगणना कार्यक्रम के प्रमुख थे.

अब भारतीय जनता पार्टी आक्रामक होकर उल्टा कांग्रेस पर सवाल खड़े कर रही है कि जिस एनपीआर का वह विरोध कर रही है, सत्ता में रहते हुए ख़ुद उसने उसे लागू किया था.

अब सीएए और एनआरसी से शुरू हुई बहस एनपीआर पर आकर उलझ गई है और सत्ताधारी बीजेपी व विपक्षी दलों के नेता इसी मसले पर आपस में उलझे हुए हैं.

इस बीच सवाल खड़ा होता है कि क्या वाकई एनपीआर को केंद्र सरकार इसलिए लाई ताकि सीएए और एनआरसी के विवाद से ध्यान बंटाया जाए? इस प्रश्न पर भी चर्चा हो रही है कि ख़ुद 2011 में एनपीआर लागू करने वाली कांग्रेस कहीं अब बैकफ़ुट पर तो नहीं आई गई है जिससे सीएए और एनआरसी के विरोध में उसकी आवाज़ कमज़ोर पड़ सकती है?

इन्हीं सवालों को लेकर बीबीसी संवाददाता आदर्श राठौर ने बात की वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह और रशीद किदवई से. पढ़ें, क्या मानना है उनका.

सबसे पहले तो यह समझना ज़रूरी है कि एनपीआर की बात कहां से आई. दरअसल, कारगिल युद्ध के बाद एक कमेटी बनी- कारगिल रिव्यू कमेटी. उसने साल 2000 में सिफ़ारिश की कि पूरे देश के नागरिकों का एक जनसंख्या रजिस्टर बनना चाहिए, यह सुरक्षा की दृष्टि से ज़रूरी है.

अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने इस सिफ़ारिश को स्वीकार किया और इसके हिसाब से 2003 में नागरिकता क़ानून में संशोधन किया गया. उसमें भारत के सभी नागरिकों का एक रजिस्टर बनाने का फ़ैसला किया गया, जिसमें नागरिक भी हों और ग़ैर-नागरिक भी.

इसके बाद 2004 में मंत्रियों के एक समूह को इस मुद्दे को सौंपा गया. तब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे. उस मंत्रियों के समूह ने सिफ़ारिश की कि भारत के सभी नागरिकों का एक रजिस्टर बनाना अनिवार्य है. इसके लिए नागरिकता संशोधन क़ानून में धारा 14 ए जोड़ी गई है.

तीन दिसंबर 2004 के बाद से उस धारा के तहत देश के सभी नागरिकों का पंजीकरण करना और रजिस्टर बनाकर रखना अनिवार्य है. यह किसी के लिए वैकल्पिक नहीं है.

कांग्रेस सरकार ने इसे आगे बढ़ाते हुए एक पायलट प्रॉजेक्ट चलाया. इसके तहत 2009 से 2011 के बीच कुछ ज़िलों, ख़ासकर तटीय ज़िलों में एनपीआर के तहत पहचान पत्र दिए गए.

सात जुलाई 2012 को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा सिंह पाटिल को भी गृहमंत्री पी चिदबंरम ने पहला पहचान पत्र भेंट किया था. अप्रैल 2010 से सितंबर 2010 के बीच जो एनपीआर की प्रक्रिया हुई, उसे केंद्र से जोड़ा गया. 2015 में मोदी सरकार ने उस एनपीआर को अपडेट किया.

इस एनपीआर को अपडेट किया जाना होता है. इसीलिए जनगणना के तहत इसे अपडेट करने का सरकार ने फ़ैसला किया है.

सरकार ने कोई नई चीज़ नहीं की. जो चला आ रहा था, उसे केवल अपडेट किया जाना है. ठीक उसी तरह से, जैसे ड्राइविंग लाइसेंस या वोटर आईडी जैसे अन्य पहचान पत्रों आदि का रिन्यूअल या अपडेशन होता है.

यह अपडेशन दो कारणों से होता है- इससे सरकारों को कल्याणकारी योजनाएं बनाने में फ़ायदा मिलता है और सुरक्षा एजेंसियों को किसी नागरिक के बारे मे जानकारी लेने में सुविधा होती है.

नेशनल आई कार्ड बनाने की प्रक्रिया 2003 में बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए की सरकार के दौरान शुरू हुई थी, उसे कांग्रेस ने आगे बढ़ाया था.

मौजूदा सरकार ने कोई नई पहल नहीं की है. इसी कारण कांग्रेस के लिए बड़ी मुश्किल हो गई है. चिदंबरम के भाषण का वीडियो सामने आया है, तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को पहचान पत्र दिए जाने की बात सामने आ रही है.

सीएए यानी नागरिकता संशोधन क़ानून को लेकर इस आशंका से विरोध शुरू हुआ कि इसके बाद एनआरसी लागू होगी. यह निष्कर्ष निकलना भी ग़लत नहीं था. लेकिन इसके बाद भ्रम फैलाया गया है कि भारतीय मुसमलानों की नागरिकता की समाप्त कर दी जाएगी जो बिल्कुल ग़लत है. जो संशोधन हुआ है, सभी को मालूम है कि तीन देशों के अल्पसंख्यक शरणार्थियों को नागरिकता देने से जुड़ा है.

दूसरी बात यह है कि एनआरसी कब लागू होगी, इस पर चर्चा हो सकती है. लेकिन इस सवाल का कोई अर्थ नहीं है कि एनआरसी लागू होगी या नहीं. क्योंकि इसकी व्यवस्था तो ख़ुद यूपीए सरकार कर चुकी है. उस समय इसका नाम नेशनल रजिस्टर ऑफ़ इंडियन सिटिज़ंस (एनआरआईसी) था. इसलिए एनआरसी को स्वाभाविक तौर पर लागू होना ही है.

कांग्रेस बैकफ़ुट पर इसलिए आती दिख रही है क्योंकि बीजेपी ने अभी जो कुछ किया है, उससे ज़्यादा तो वह ख़ुद कर चुकी है. बीजेपी उसे बस लॉजिकल एंड तक ले जाने की कोशिश कर रही है.

विरोध का जो पूरा आधार कांग्रेस ने खड़ा किया था, उसमें इतने छेद हो गए हैं कि अब उसे मुश्किलें हो रही हैं. अगर एनपीआर को लेकर पहले पार्टी की ओर से बयान आया होता, उसके मेनिफेस्टो में जिक्र होता तो कांग्रेस आसानी से कह सकती थी कि पहले बेशक हमने ऐसा कहा था लेकिन अब हम इसके पक्ष में नहीं हैं.

लेकिन कांग्रेस के नेतत्व वाली यूपीए की जो सरकारें 10 साल रहीं, उसी दौरान यह काम हुआ है. ऐसे में उदौरान उठाए गए क़दमों से पीछे हटना कांग्रेस के लिए मुश्किल है. अब वह ऐसा नहीं कह सकती कि जो हम कर रहे थे, वह अच्छा था मगर ये सरकार कर ही है तो बुरा है.

हर मामले के दो पहलू होते हैं- एक राजनीतिक और दूसरा तकनीकी पहलू. एक ही बिल को लाने का हर सरकार का उद्देश्य अलग-अलग होता है यानी उसके पीछे एक राजनीति रहती है.

एनपीआर को लेकर विपक्ष बहुत आपत्ति नहीं कर रहा. लेकिन समझा जा रहा है कि एनआरसी को लेकर हुए विवाद पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रामलीला मैदान में जो बयान दिया, उसके बाद ऐसा लग रहा है कि एनपीआई लाकर कवर अप करने की कोशिश की जा रही है.

जब तलवारें खिंची होती हैं तो उन्हें वापस डालना थोड़ा मुश्किल होता है. कांग्रेस बहुत ज़्यादा बैकफ़ुट पर इसलिए नहीं आई है कि क्योंकि यूपीए की सरकार को 2014 में ही ख़त्म हो गई थी.

अब कांग्रेस को सत्ता से हटे छह साल हो गए हैं. उस दौरान क्या हुआ, यह बात ध्यान में नहीं है. राजनीति उसी के इर्द-गिर्द घूम रही है जो आज हो रहा है.

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